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Utkarsh Classes
Updated: 14 Mar 2024
5 Min Read

13 मार्च 2024 को, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 201 के तहत उत्तराखंड समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पर अपनी सहमति दे दी है। उत्तराखंड विधानसभा ने 17 फरवरी 2024 को विधेयक पारित किया था । विधेयक के कानून बनने के साथ ही उत्तराखंड ,स्वतंत्रता के बाद ,समान नागरिक संहिता(यूसीसी) को लागू करने वाला भारत का पहला राज्य बन गया।
उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत विधेयक को राष्ट्रपति के पास उनकी सहमति के लिए भेजा था । राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 201 के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए विधेयक को मंजूरी दे दी है।
संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत, किसी राज्य के राज्यपाल को राज्य विधायिका द्वारा पारित विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए अनिवार्य रूप से आरक्षित करना होता है यदि विधेयक:
कुछ मामलों में, यदि राज्यपाल चाहे तो राज्य विधायिका द्वारा पारित विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित कर सकते हैं अगर वो विधेयक राज्यपाल के अनुसार-
कानूनी प्रणाली की दो शाखाएँ हैं:
आपराधिक कानून समाज के विरुद्ध अपराधों, जैसे हत्या, चोरी, सेंधमारी और आगजनी इत्यादि से संबंधित है। समाज के विरुद्ध अपराध के आरोपी व्यक्ति को अदालत द्वारा दंडित किया जाता है।
नागरिक कानून दो पक्षों के बीच विवादों से संबंधित है। यहाँ पक्ष व्यक्ति या संगठन हो सकता हैं।
नागरिक कानून में किसी व्यक्ति की शादी, तलाक, बच्चा गोद लेना, संपत्ति, उत्तराधिकार आदि से संबंधित विवाद आते हैं।
दोनों के बीच मुख्य अंतर यह है कि आपराधिक कानून सजा पर केंद्रित है जबकि नागरिक कानून विवाद समाधान पर केंद्रित है।
भारत में आपराधिक कानून के संदर्भ में एकरूपता है। इसका मतलब यह है कि किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके द्वारा किए गए अपराध की प्रकृति के आधार पर किया जाता है, न कि वह मुस्लिम, हिंदू, ईसाई आदि है या नहीं। यहां, व्यक्ति की धार्मिक पृष्ठभूमि कोई मायने नहीं रखती है।
गोवा और उत्तराखंड को छोड़कर भारत में कोई सामान नागरिक कानून नहीं है। इसका मतलब यह है कि किसी व्यक्ति के विवाह, तलाक आदि से संबंधित मामले संबंधित पक्षों के रीति-रिवाजों और परंपराओं के आधार पर तय किए जाते हैं। यदि किसी मुस्लिम समुदाय से जुड़ा तलाक का मामला है, तो अदालत मुसलमानों के रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार मामले का फैसला करेगी।
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