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इसरो का चंद्रयान 3: भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर ऐतिहासिक सॉफ्ट लैंडिंग के लिए तैयार
Updated: 23 Aug 2023
5 Min Read

दुनिया की नजर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के चंद्रयान-3 मिशन पर है क्योंकि आज तक कोई भी देश चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर अपना लैंडर या रोवर सफलतापूर्वक उतारने में सफल नहीं हुआ है। चंद्रयान-3 चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर 23 अगस्त 2023 को एक लैंडर विक्रम और एक रोवर प्रज्ञान को उतारने का प्रयास करेगा। यह 2019 के बाद इसरो का चांद के दक्षिणी ध्रुव पर लैंडर उतारने का दूसरा प्रयास होगा।
इसरो का चंद्रयान-3 मिशन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि रूस का चंद्रमा की सतह पर एक लैंडर, लूना 25 को उतारने का रूसी प्रयास पहले ही विफल हो चुका है।
चंद्रमा का अध्ययन करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के मिशन को चंद्रयान कहा जाता है। चंद्रयान मिशन इसरो का पहला गहन अंतरिक्ष मिशन था। इसरो पहले ही चंद्रयान-1,2 और 3 नाम से चंद्रमा के लिए तीन मिशन लॉन्च कर चुका है। चंद्रयान कार्यक्रम की घोषणा प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 15 अगस्त 2003 को अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में की थी।
केवल तीन देश, संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ (अब रूस) और चीन चंद्रमा पर अपने लैंडर और रोवर्स को सफलतापूर्वक उतारने में कामयाब रहे हैं।
चंद्रमा पर सफलतापूर्वक रोवर उतारने वाला पहला देश सोवियत संघ था। सोवियत संघ का लूना 17 लैंडर, रोवर लूनोखोद 1 को लेकर 17 नवंबर 1970 को चंद्रमा की सतह पर सफलतापूर्वक उतरा था।
चंद्रयान-3 को इसरो द्वारा 14 जुलाई 2023 को श्रीहरिकोटा से जीएसएलवी-मार्क III (एलवीएम-3) हेवी-लिफ्ट रॉकेट पर लॉन्च किया गया था। अंतरिक्ष यान में विक्रम नामक एक लैंडर और प्रज्ञान नामक एक रोवर शामिल है। चंद्रयान-2 के विपरीत चंद्रयान-3 मिशन में कोई ऑर्बिटर नहीं है। मिशन का अनुमानित बजट 615 करोड़ रुपये है।
चंद्रयान-3 लैंडर विक्रम लगभग 2 मीटर लंबा है और इसका वजन 1,700 किलोग्राम से थोड़ा अधिक है। यह अपने साथ 26 किलोग्राम वजनी चंद्र रोवर 'प्रज्ञान' ले जा रहा है। चंद्र रोवर प्रज्ञान चंद्र सतह की खनिज संरचना का स्पेक्ट्रोमीटर विश्लेषण सहित कई प्रयोगों का संचालन करेगा।
लैंडर चंद्रमा के सतह पर 23 अगस्त 2023 को उतरेगा और फिर रोवर को विकसित करेगा।
इसरो के अनुसार चंद्रयान-3 मिशन के उद्देश्य हैं:
विक्रम और प्रज्ञान दोनों को 1 चंद्र दिवस (पृथ्वी के 14 दिन) तक संचालित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है ।
चंद्रयान -2 को इसरो द्वारा 22 जुलाई 2019 को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा द्वीप पर स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च वाहन मार्क III (जीएसएलवी-मार्क III) रॉकेट द्वारा अन्तरिक्ष में लॉन्च किया किया गया था। मिशन का अनुमानित बजट 978 करोड़ रुपये था।
अंतरिक्ष यान में एक ऑर्बिटर, विक्रम नामक एक लैंडर और प्रज्ञान (संस्कृत अर्थ ज्ञान) नामक एक रोवर शामिल था।
ऑर्बिटर अभी भी 100 किमी की ऊंचाई पर ध्रुवीय कक्षा में चंद्रमा की परिक्रमा कर रहा है और इसका नियोजित मिशन जीवनकाल साढ़े सात साल है।
मिशन के विक्रम लैंडर (जिसे इसरो के संस्थापक विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया है) को 7 सितंबर 2019 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में उतारने की योजना बनाई गई थी, जहाँ सतह के नीचे पानी की बर्फ मिल सकती थी।
विक्रम और प्रज्ञान दोनों को 1 चंद्र दिवस (पृथ्वी के 14 दिन) तक संचालित करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। हालांकि, विक्रम के चंद्रमा पर उतरने से ठीक पहले 2 किमी की ऊंचाई पर संपर्क टूट गया था।
यह इसरो का पहला गहन अंतरिक्ष मिशन था। 590 किलोग्राम वजनी चंद्रयान- I को 22 अक्टूबर 2008 को इसरो द्वारा आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा द्वीप पर स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से PSLV-C11 रॉकेट द्वारा अन्तरिक्ष में लॉन्च किया किया गया था। मिशन का अनुमानित बजट 386 करोड़ रुपये था।
चंद्रयान-I मिशन में एक मून इम्पैक्ट प्रोब (एमआईपी) शामिल था, जिसे भविष्य में लैंडिंग के लिए सिस्टम का परीक्षण करने और चंद्रमा की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त होने से पहले पतले चंद्रमा की वायुमंडल का अध्ययन करने के लिए डिज़ाइन किया गया था।
एमआईपी को 14 नवंबर 2008 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर शेकलटन क्रेटर के पास जानबूझकर इसरो द्वारा दुर्घटनाग्रस्त कर दिया गया था। लेकिन, दुर्घटनाग्रस्त होने से पहले इसने चंद्रमा के वायुमंडल में थोड़ी मात्रा में पानी की खोज की थी।
चंद्रयान -1 मिशन को 2 साल तक चलने के लिए डिज़ाइन किया गया था, लेकिन 20 अगस्त 2009 को इसरो ने इसके साथ रेडियो संपर्क खो दिया था । हालांकि चंद्रयान -1 को बाद में 2017 में नासा द्वारा खोजा गया, जो अभी भी चंद्रमा की कक्षा में चाँद का चक्कर लगा रहा है।
परीक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण फुल फॉर्म
इसरो/ISRO: इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनिज़ैशन (Indian Space Research Organisation)
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