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Updated: 19 May 2026
3 Min Read

झारखंड, पलामू टाइगर रिज़र्व में देश का पहला समर्पित 'मानव-हाथी संघर्ष अनुसंधान केंद्र' स्थापित करने जा रहा है।
इसका उद्देश्य मानव और हाथियों के बीच बढ़ते संघर्षों का अध्ययन करना और हताहतों की संख्या तथा आवास संबंधी तनाव को कम करने के लिए वैज्ञानिक समाधान विकसित करना है।
यह प्रस्तावित केंद्र, रिज़र्व क्षेत्र के भीतर पलामू किला और कमलदह झील के बीच चिह्नित लगभग 20 एकड़ ज़मीन पर बनाया जाएगा। इस परियोजना का प्रस्ताव झारखंड सरकार द्वारा तैयार किया गया है और इसे आगे की मंज़ूरी के लिए जमा कर दिया गया है।
अधिकारियों ने बताया कि यह केंद्र वैज्ञानिक उपकरणों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित प्रणालियों का उपयोग करके हाथियों के व्यवहार के पैटर्न, संघर्ष के कारणों, झुंड की आवाजाही, आवास संबंधी तनाव और मानवीय प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण करेगा।
यह सुविधा उन राज्यों के लिए एक दीर्घकालिक निर्णय-समर्थन और नीति अनुसंधान केंद्र के रूप में भी काम करने की उम्मीद है, जहाँ बार-बार मानव-हाथी संघर्ष की समस्याएँ सामने आती हैं।
शोधकर्ता संघर्ष की स्थितियों, प्रजनन काल, बच्चे के जन्म, मौसमी बदलावों, आपसी संचार के संकेतों, भोजन और पानी की तलाश में आवाजाही तथा ख़तरे या पर्यावरणीय तनाव के प्रति हाथियों के व्यवहार का अध्ययन करेंगे।
भारतीय वन्यजीव संस्थान की वर्ष 2025 की 'हाथी स्थिति रिपोर्ट' के अनुसार, झारखंड में 217 हाथी हैं। इनमें से लगभग 130 हाथी पलामू टाइगर रिज़र्व में पाए जाते हैं, जो कि राज्य में हाथियों की सबसे अधिक सघनता वाला क्षेत्र है।
वन अधिकारियों ने बताया कि झारखंड में अभी 17 हाथी गलियारे हैं और इंसान-हाथी संघर्ष एक बड़ी चिंता बना हुआ है। जनवरी, 2026 से अब तक राज्य में ऐसी घटनाओं में 30 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि वर्ष 2019 से 2024 के बीच 474 मौतें दर्ज की गईं।
भारत में पहली राष्ट्रीय स्तर की DNA-आधारित हाथी गणना में पिछले आठ वर्षों में देश की हाथी संख्या में 25% की गिरावट पाई गई है, जो आवास हानि, विखंडन और मानव-हाथी संघर्ष जैसी बढ़ती चुनौतियों को दर्शाती है।
रिपोर्ट ‘भारत में हाथियों की स्थिति: हाथियों का डीएनए आधारित समकालिक अखिल भारतीय जनसंख्या अनुमान (SAIEE 2021–25)’ के अनुसार, भारत में हाथियों की संख्या 22,446 है, जबकि वर्ष 2017 में यह 29,964 थी।
यह अभ्यास वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) द्वारा प्रोजेक्ट एलीफेंट (1992) के तहत किया गया।
अध्ययन का महत्त्व: यह अध्ययन दृश्य और मल-आधारित गणना से हटकर DNA मार्क–रिकैप्चर तकनीक पर आधारित है, जिससे हाथियों की संख्या का अधिक वैज्ञानिक और सटीक अनुमान लगाया जा सकता है।
DNA आधारित तरीका: यह पद्धति, जो बाघों की गणना में प्रयुक्त होती है, विशिष्ट आनुवंशिक मार्करों/चिह्नों के माध्यम से व्यक्तिगत हाथियों की पहचान करती है, जिससे हाथियों की विशिष्ट शारीरिक विशेषताओं की कमी की समस्या को दूर किया जा सकता है।
कर्नाटक – 6,013
असम – 4,159
तमिलनाडु – 3,136
केरल – 2,785
उत्तराखंड – 1,792
ओडिशा – 912
पश्चिमी घाट: 11,934 हाथी (2017 में 14,587)
उत्तर-पूर्वी पहाड़ियाँ और ब्रह्मपुत्र मैदान: 6,559 (2017 में 10,139)
मध्य भारत की पठारी और पूर्वी घाट: 1,891 (2017 में 3,128)
शिवालिक–गंगा मैदान: 2,062 (लगभग अपरिवर्तित, 2017 में 2,085)
असम (सोनितपुर, गोलाघाट) और मध्य भारत (झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा) में यह संघर्ष सर्वाधिक है।
मध्य भारत में, जहाँ हाथियों की संख्या 10% से भी कम है, हाथियों के कारण होने वाली 45% मानव मृत्यु होती हैं।
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