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Updated: 14 Nov 2025
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भारत सरकार ने दो पारंपरिक लेप्चा वाद्ययंत्रों - तुंगबुक और पुमटोंग पुलित - को भौगोलिक संकेत (जीआई) पंजीकरण प्रदान किया है, जिनका संबंध सिक्किम के लेप्चा समुदाय से है।
भारत सरकार ने दो पारंपरिक लेप्चा वाद्ययंत्रों - तुंगबुक और पुमटोंग पुलित - को भौगोलिक संकेत (जीआई) पंजीकरण प्रदान किया है, जिससे सिक्किम के लेप्चा समुदाय को एक बड़ा सांस्कृतिक प्रोत्साहन मिला है।
संस्कृति, जनजातीय मामलों और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालयों द्वारा नई दिल्ली में आयोजित प्रथम जनजातीय व्यापार सम्मेलन के दौरान कल औपचारिक रूप से जीआई पंजीकरण प्रमाणपत्र प्रदान किए गए।
जीआई टैग वाले सिक्किम के अन्य उत्पादों में सिक्किम बड़ी इलायची और दल्ले खुरसानी भी शामिल हैं।
तुंगबुक एक तीन-तार वाला वाद्ययंत्र है, जबकि पुमटोंग पुलित एक बाँस की बांसुरी है। दोनों लेप्चा लोक संगीत का अभिन्न अंग हैं और इनका गहरा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्त्व है।
उगेन पलज़ोर लेप्चा और नामग्याल लेप्चा, जिन्होंने क्रमशः सिक्किम लेप्चा तुंगबुक और सिक्किम लेप्चा पुमटोंग पुलित के लिए जीआई टैग आवेदन प्रस्तुत किए थे, ने इस कार्यक्रम में प्रमाण पत्र प्राप्त किए।
नाबार्ड, गंगटोक ने जीआई आवेदन प्रक्रिया में व्यापक सहयोग दिया। जीआई टैग प्राप्त करने में लगभग दो वर्ष का समय लगा। लेप्चा समुदाय ने जीआई टैग प्राप्त करने में शामिल सभी लोगों, विशेष रूप से राष्ट्रीय दर्जा प्राप्त करने के इस प्रयास में दो वर्षों के सहयोग के लिए नाबार्ड का आभार व्यक्त किया।
प्राचीन लेप्चा साम्राज्य, जो उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में तितलैया (अब बांग्लादेश में) तक और पूर्व में सिक्किम, भूटान और तिब्बत के त्रिसंगम स्थल गिपमोची पर्वत से लेकर पश्चिम में नेपाल की अरुण नदी तक फैला हुआ था।
इस विशाल, प्राचीन लेप्चा साम्राज्य को उस समय 'न्ये मायेल ल्यांग' के नाम से जाना जाता था, जिसका शाब्दिक अर्थ है 'पवित्र, गुप्त, शाश्वत भूमि'। लेप्चा प्रकृति पूजक होने के कारण संगीत और गायन के बहुत शौकीन होते हैं, इसलिए उनके पास विभिन्न प्रकार के वाद्ययंत्र होते हैं।
अप्रैल, 2024 से मार्च, 2025 तक 23 नए जीआई टैग जोड़े गए, जिससे कुल 658 हो गए हैं-कुछ उदाहरण हैं-
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह: वर्जिन नारियल तेल, करेन मुसली चावल और निकोबारी हुदी नाव।
तेलंगाना - वारंगल चपाता मिर्च (टोमैटो चिली)
केरल - आदिवासी हस्तशिल्प कन्नडिप्पया
तमिलनाडु: वीरू धुनगर सांबा बटल मिर्च।
उत्तर प्रदेश: बनारसी तबला, बनारसी भरवां मिर्च, शहनाई, धातु ढलाई शिल्प, भित्ति चित्र, लाल पेड़ा, ठंडाई, तिरंगी बर्फी, चिरगांव का करोंदा, बरेली फर्नीचर, ज़री ज़रदोज़ी और टेराकोटा।
असम: मांजुली मुखौटे और पांडुलिपि पेंटिंग।
GI 10 वर्षों के लिये वैध होता है और इसे नवीनीकृत किया जा सकता है। GI पंजीकरण की देखरेख वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग द्वारा की जाती है। सरकार का लक्ष्य 2030 तक 10,000 जीआई टैग तक पहुँचना है।
2025 तक उत्तर प्रदेश के पास 77 सबसे ज़्यादा भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग है, उसके बाद तमिलनाडु का स्थान है।
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