जम्मू- कश्मीर के बारामूला के ज़ेहनपोरा में टीलों से 2000 साल प्राचीन बौद्ध स्तूप और शहरी-प्रकार की बस्तियाँ की खोज हुई है।
- सेब के बागों और धान के खेतों के बीच, झेलम नदी के किनारे एक घाटी में, कई टीले थे जिन्होंने ज़ेहनपोरा गाँव के स्थानीय लोगों के बीच लंबे समय से जिज्ञासा जगा रखी थी।
- पिछले कुछ सालों में, श्रीनगर और दिल्ली के पुरातत्वविदों ने जम्मू और कश्मीर के बारामूला जिले में इस गाँव का दौरा किया। उन्होंने सर्वे किए और सामान्य दिखने वाले टीलों के बारे में अनुमान लगाए।
- ज़ेहनपोरा गाँव में इस खोज में कुषाण काल के स्तूप, मठ भवन और अन्य संरचनाएँ सामने आई।
- जब पुरातत्वविदों ने टीलों का व्यवस्थित अध्ययन शुरू किया, जो कंधार और उससे आगे जाने वाले एक प्राचीन सिल्क रूट के किनारे स्थित हैं और ड्रोन सर्वे, हवाई फोटोग्राफी और मैपिंग का इस्तेमाल किया, तो यह साफ हो गया कि वे एक प्राचीन संरचना का हिस्सा थे।
फ्रेंच म्यूज़ियम इस खोज का प्रेरक
- इस खोज की शुरुआत एक अजीब सुराग से हुई। एक फ्रेंच म्यूज़ियम में रखी तीन स्तूपों की धुंधली, दशकों पुरानी तस्वीरों ने रिसर्चर्स का ध्यान खींचा।
- उन तस्वीरों से ज़ेहनपोरा में नए सर्वे शुरू हुए, जिससे आखिरकार एक महत्त्वपूर्ण बौद्ध परिसर का पता चला जो इस क्षेत्र की प्राचीन सभ्यता पर नई रोशनी डालता है।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लेटेस्ट 'मन की बात' संबोधन के अनुसार, "बारामूला की उस तस्वीर में तीन बौद्ध स्तूप दिखाई दे रहे थे। वहाँ से, खोज का सिलसिला बदल गया, और कश्मीर का भूला हुआ अतीत सामने आने लगा। यह इतिहास लगभग 2,000 साल पुराना है।"
ज़ेहनपोरा में बौद्ध स्तूप
- कश्मीर की बौद्ध जड़ें फिर से सामने आईं, ज़ेहनपोरा कश्मीर को गांधार बौद्ध नेटवर्क से जोड़ता है।
- ज़ेहनपोरा एक प्राचीन व्यापार और तीर्थयात्रा मार्ग पर स्थित है जो कभी गांधार को कश्मीर से जोड़ता था, जिससे पता चलता है कि इस क्षेत्र ने सांस्कृतिक और धार्मिक आदान-प्रदान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
- ज़ेहनपोरा में हुई खोज कश्मीर के लंबे समय से अनदेखे बौद्ध अध्याय को सामने लाती है, जो अशोक के शासनकाल (268 से 232 ईसा पूर्व) के दौरान शुरू हुआ था, और कुषाण युग (पहली से तीसरी शताब्दी ईस्वी) तक जारी रहा, जब यह घाटी मठवासी शिक्षा का एक सक्रिय केंद्र थी।
कुषाण साम्राज्य
- कुषाण एक शक्तिशाली प्राचीन राजवंश थे जिन्होंने पहली से तीसरी शताब्दी ईस्वी के बीच उत्तरी भारत और मध्य एशिया के बड़े हिस्सों पर शासन किया और भारत और उसके बाहर व्यापार, शहरी केंद्रों और बौद्ध धर्म के प्रसार में प्रमुख भूमिका निभाई।
- कुजुल कडफिसेस ने स्थापना की। यह साम्राज्य ताजिकिस्तान से गंगा घाटी तक फैला था।
- प्रमुख शासक: कनिष्क (सबसे प्रतापी), विम कडफिसेस।
- स्वर्ण मुद्राएँ: कुषाणों ने भारत में बड़े पैमाने पर और उच्च शुद्धता वाले सोने के सिक्के जारी किए।
- रेशम मार्ग: इस मार्ग पर नियंत्रण से भारी राजस्व प्राप्त किया।
- प्रशासन: क्षत्रप प्रणाली (प्रांतीय राज्यपाल) और 'राजाओं का राजा' (King of Kings) जैसी पदवियाँ अपनाई।
- पोशाक: भारत में बेहतर घुड़सवार सेना, पगड़ी, अंगरखी और पतलून का प्रचलन शुरू किया।
- पतन और उत्तरवर्ती वंश: 3सरी शताब्दी के आसपास पतन के बाद नागवंश, मौखरि और मघराज वंश का उदय हुआ।
सांस्कृतिक और कलात्मक योगदान:
- गांधार शैली: ग्रीक-बौद्ध शैली का विकास।
- मथुरा कला: शिव-पार्वती और लक्ष्मी की छवियों के साथ मूर्तियाँ।
- बौद्ध धर्म: कनिष्क ने कश्मीर में चतुर्थ बौद्ध संगीति आयोजित की।