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Updated: 20 Mar 2026
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चीन ने अपने 628 Xiaokang, या "समृद्ध गाँवों" में से 72% गाँव पूर्वोत्तर राज्यों में Line of Actual Control (LAC) के पास बनाए हैं, जिनमें से 90% अरुणाचल प्रदेश में हैं।
चीनी “ज़ियाओकांग” विलेज उन विशेष सीमा बस्तियों को संदर्भित करते हैं जिन्हें मुख्यतः तिब्बत ऑटोनॉमस रीजन में विवादित सीमावर्ती क्षेत्रों के साथ निर्मित अथवा उन्नत किया गया है। “ज़ियाओकांग” शब्द का अर्थ है “मध्यम रूप से समृद्ध” या “संपन्न”।
ये जानकारी सेना के उप-प्रमुख (रणनीति), लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने वार्षिक असम राइफल्स-USI सेमिनार में अपने संबोधन के दौरान दी।
विवादित क्षेत्रों में निर्मित ये द्वि-उपयोगी (नागरिक–सैन्य) विलेज वस्तुतः स्थायी एवं सुदृढ़ चौकियों के रूप में कार्य करते हैं, जो दीर्घकाल में भारत की सुरक्षा तथा संप्रभुता के लिए एक गंभीर चुनौती उत्पन्न कर सकते हैं।
ये बस्तियाँ सैन्य–नागरिक उद्देश्यों के एकीकरण, निरंतर निगरानी तथा सीमा क्षेत्रों में उपस्थिति को सुदृढ़ करने में सहायक है, जिससे भारत की उत्तर-पूर्वी सीमाओं पर दबाव बढ़ता है।
यह परियोजना वर्ष 2017 में तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र की सरकार द्वारा प्रारंभ की गई थी। इसके अंतर्गत 21 सीमावर्ती काउंटी में कुल 628 विलेज का विकास किया जा रहा है, जिसमें लगभग 30 बिलियन युआन का सरकारी निवेश किया गया है।
यद्यपि इसे ग्रामीण क्षेत्रों के पुनरुत्थान की पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया है, किंतु ये बस्तियाँ द्वि-उपयोगी अवसंरचना के रूप में कार्य करती हैं। आवश्यकता पड़ने पर यहाँ पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के सैनिकों को ठहराया जा सकता है तथा विवादित क्षेत्रों में त्वरित सैन्य तैनाती और गतिशीलता को सुगम बनाया जा सकता है।
इन विलेज का निर्माण चाइना लैंड बॉर्डर लॉ, 2022 द्वारा समर्थित है, जो सीमा सुरक्षा को सुदृढ़ करने तथा सीमा रक्षा को सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ समन्वित करने पर बल देता है।
इस प्रकार यह पहल “विलेज की दीवार” के रूप में कार्य करती है, जो ग्रे-ज़ोन रणनीतियों के माध्यम से वास्तविक नियंत्रण और क्षेत्रीय दावों को मज़बूत करने का प्रयास करती है।
वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम: सीमावर्ती गाँवों के आधुनिकीकरण के लिए 663 गाँवों का विकास।
सैन्य और कूटनीतिक वार्ता: 2020 के बाद से डिसएंगेजमेंट (सेना वापसी) के लिए कोर कमांडर स्तर की बैठकें।
बीआरओ (BRO) द्वारा विकास: अटल सुरंग जैसी रणनीतिक कनेक्टिविटी।
गश्त समझौता: अक्टूबर 2024 में, देपसांग और डेमचोक में 2020 के बाद पहली बार पीछे हटने और गश्त करने पर सहमति बनी।
ब्रिक्स वार्ता: अक्टूबर 2024 में रूसी सम्मेलन में भारत-चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच 5 साल बाद औपचारिक वार्ता।
वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) औपचारिक अंतर्राष्ट्रीय सीमा के अभाव में यह मुख्यतः 1962 के भारत–चीन युद्ध के बाद की सैन्य स्थितियों के आधार पर विकसित हुई। इस अवधारणा का प्रस्ताव पहली बार वर्ष 1959 में चीन के प्रधानमंत्री झोउ एनलाई ने रखा था।
प्रारंभ में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे अस्वीकार कर दिया था, परंतु बाद में क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के उद्देश्य से भारत ने वर्ष 1993 के बॉर्डर पीस एंड ट्रैंक्विलिटी एग्रीमेंट (BPTA) के अंतर्गत इसे औपचारिक रूप से स्वीकार किया।
वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) को तीन क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है— पश्चिमी क्षेत्र (लद्दाख/अक्साई चिन), जहाँ सबसे अधिक तनाव देखा जाता है; मध्य क्षेत्र (उत्तराखंड/हिमाचल प्रदेश), जो अपेक्षाकृत सबसे कम विवादित क्षेत्र है तथा पूर्वी क्षेत्र (अरुणाचल प्रदेश/सिक्किम), जो मुख्यतः मैकमोहन रेखा का अनुसरण करता है।
पूर्वी क्षेत्र में भारत वर्ष 1914 के शिमला सम्मेलन में निर्धारित मैकमोहन रेखा को सीमा के रूप में स्वीकार करता है, जबकि चीन इसकी कानूनी वैधता को अस्वीकार करता है और अरुणाचल प्रदेश को “दक्षिण तिब्बत” कहकर संबोधित करता है।
संघर्ष का एक प्रमुख कारण LAC की लंबाई को लेकर मतभेद है। भारत के अनुसार इसकी लंबाई लगभग 3,488 किमी. है, जबकि चीन इसे लगभग 2,000 किमी. मानता है। इस अंतर के कारण कई क्षेत्रों में ग्रे ज़ोन में दावों का ओवरलैप होता है।
हिमालयी क्षेत्र के दुर्गम भूभाग और अस्पष्ट सीमांकन के कारण कई स्थानों पर आमने-सामने की स्थिति उत्पन्न होती रहती है, जैसे- डेपसांग मैदान, गलवान घाटी, वान वैली, पैंगोंग त्सो झील तथा तवांग।
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