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भारत IMI-रेसिस्टेंट सरसों की हाइब्रिड किस्मों की बड़े पैमाने पर खेती शुरू करेगा
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Updated: 13 Jun 2026
2 Min Read

भारत 2026-27 के रबी बुवाई सीज़न में इमिडाज़ोलिनोन-रेसिस्टेंट (IMI-रेसिस्टेंट) सरसों की हाइब्रिड किस्मों की बड़े पैमाने पर खेती शुरू करने जा रहा है।
IMI-रेसिस्टेंट सरसों हाइब्रिड – सरसों की वे किस्में जो इमिडाज़ोलिनोन (imidazolinone) हर्बिसाइड (खरपतवार नाशक) के प्रति रेसिस्टेंट (प्रतिरोधी) होती हैं।
इसे ओरोबैंचे (Orobanche) नाम के परजीवी खरपतवार की समस्या से निपटने के लिए बनाया गया है, जो तिलहन उत्पादन में एक बड़ी बाधा है।
सरसों एक प्रमुख तिलहन फसल है। भारत ने वर्ष 2024-25 में लगभग ₹1.6 लाख करोड़ मूल्य का करीब 16 मिलियन टन खाद्य तेल आयात किया।
इसे म्यूटेशन ब्रीडिंग नाम की प्रक्रिया से विकसित किया गया है, जिसमें वैज्ञानिक कुछ खास प्राकृतिक म्यूटेशन को बनाए रखने के लिए फसलों की ब्रीडिंग करते हैं।
यह प्रक्रिया एसिटोलैक्टेट सिंथेस (ALS) नाम के एंजाइम पर आधारित है, जो पौधों की वृद्धि के लिए ज़रूरी है।
IMI हर्बिसाइड्स ALS एंजाइम को रोकते हैं, जिससे वृद्धि में बाधा आती है और पौधा मर जाता है।
IMI-रेसिस्टेंट हाइब्रिड एक म्यूटेशन ALS एंजाइम को बदल देता है, जिससे हर्बिसाइड बाइंडिंग नहीं हो पाती।
IMI-रेसिस्टेंट (इमिडाज़ोलिनोन-रेसिस्टेंट) सरसों की हाइब्रिड किस्में, दिल्ली यूनिवर्सिटी के 'सेंटर फॉर जेनेटिक मैनिपुलेशन ऑफ़ क्रॉप प्लांट्स' (CGMCP) में डॉ. दीपक पेंटल और उनके वैज्ञानिकों की टीम ने विकसित की थीं।
इन हाइब्रिड किस्मों को 'म्यूटेशन ब्रीडिंग' तकनीक का इस्तेमाल करके विकसित किया गया था, ताकि 'एसिटोलैक्टेट सिंथेस' (ALS) एंजाइम में जान-बूझकर जेनेटिक बदलाव किए जा सकें।
इस बदलाव की वजह से सरसों के पौधे IMI हर्बिसाइड्स (खरपतवार नाशक) के इस्तेमाल के बावजूद जीवित रह पाते हैं।
ओरोबैंचे (Orobanche) एक परजीवी खरपतवार है, जो सरसों की जड़ों से जुड़ जाता है और होस्ट पौधे से पानी और पोषक तत्त्व खींचता है।
खरपतवार प्रबंधन: ओरोबैंचे/फेलिपैंचे (Phelipanche) पर असरदार नियंत्रण संभव बनाता है।
मजदूरों पर कम निर्भरता: ज़्यादा मेहनत वाले हाथ से खरपतवार हटाने के कामों की ज़रूरत को कम करता है।
हाइब्रिड: अच्छे गुणों को मिलाने के लिए जेनेटिक रूप से अलग पैरेंट पौधों की क्रॉस-ब्रीडिंग से विकसित किए जाते हैं।
GM फसलें: जेनेटिक इंजीनियरिंग तकनीकों का इस्तेमाल करके सीधे जीन डालकर या उनमें बदलाव करके विकसित की जाती हैं। जैसे, Bt कॉटन (बैसिलस थुरिंगिएंसिस से लिया गया जीन), GM सरसों।
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