पुनर्विचार या समीक्षा याचिका

पुनर्विचार या समीक्षा याचिका

चर्चा में क्यों ?

  • हाल ही के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के कुछ निर्णयों में पुनर्विचार या समीक्षा याचिका (Review Petition) दायर करने की बात की जा रही है।

ध्यातव्य बिन्दु

  • हाल ही में एक ओर याचिकाकर्त्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बाबरी मस्ज़िद-राम जन्मभूमि और दूरसंचार राजस्व मामले में दिये गए निर्णय की समीक्षा करने की योजना बनाई है।
  • वहीं दूसरी ओर सर्वोच्च न्यायालय ने सबरीमाला निर्णय की समीक्षा करने पर तो सहमति जताई लेकिन राफेल मामले की जाँच करने से इंकार कर दिया।
अयोध्या के फैसले की समीक्षा
  • अभी तक केवल ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा था कि वह निर्णय समीक्षा कराएगा। उत्तर प्रदेश सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड और अन्य याचिकाकर्त्ता इस मत पर विभाजित थे , अंतत: सुन्नी वक्फ बोर्ड ने समीक्षा याचिका ना दायर करने का फैसला किया।
  • हालाँकि अभी तक इस आधार का खुलासा नहीं किया गया है जिसके आधार पर समीक्षा याचिका दायर की जाएगी।
  • ऐसा माना जा सकता है कि ध्वस्त बाबरी मस्ज़िद के बदले सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को दी गई 5 एकड़ ज़मीन का मुद्दा महत्त्वपूर्ण है जिसे आधार बनाकर समीक्षा याचिका दायर की जा सकती है।

समीक्षा याचिका (Review petition)

संविधान के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय अंतिम निर्णय होता है।

  • हालाँकि अनुच्छेद-137 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को अपने किसी भी निर्णय या आदेश की समीक्षा करने की शक्ति प्राप्त है। ताकि किसी भी मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय भविष्य में सुनवाई के लिये आने वाले मामलों के संदर्भ में निश्चितता प्रदान करता है।
  • समीक्षा याचिका में सर्वोच्च न्यायालय के पास यह शक्ति होती है कि वह अपने पूर्व के निर्णयों में निहित ‘स्पष्टता का अभाव’ तथा ‘महत्त्वहीन आशय’ की गौण त्रुटियों की समीक्षा कर उनमें सुधार कर सकता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समीक्षाओं को स्वीकार करना दुर्लभ होता है, इसका जीवंत उदाहरण सबरीमाला और राफेल मामलों में देखने को मिलता है।
  • पिछले वर्ष सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार की याचिका पर मार्च 2018 के फैसले की समीक्षा करने की अनुमति दी थी, जिसने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार अधिनियम को कमज़ोर कर दिया था।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की समीक्षा की माँग का आधार –

  • वर्ष 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय की समीक्षा करने के तीन आधार स्पष्ट किये थे-
  1. नए और महत्त्वपूर्ण साक्ष्यों की खोज, जिन्हें पूर्व की सुनवाई के दौरान शामिल नहीं किया गया था।
  2. दस्तावेज़ में कोई त्रुटि अथवा अस्पष्टता रही हो।
  3. कोई अन्य पर्याप्त कारण (अर्थात् ऐसा कारण जो अन्य दो आधारों के अनुरूप हो)।
  • वर्ष 1975 के एक फैसले में तत्कालीन न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने कहा था कि एक समीक्षा याचिका को तभी स्वीकार किया जा सकता है जब न्यायालय द्वारा दिये गए किसी निर्णय में भयावह चूक या अस्पष्टता जैसी स्थिति उत्पन्न हुई हो।

कौन दायर कर सकता है समीक्षा याचिका ?

  • नागरिक प्रक्रिया संहिता और उच्चतम न्यायालय के नियमों के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो फैसले से असंतुष्ट है, समीक्षा याचिका दायर कर सकता है भले ही वह उक्त मामले में पक्षकार हो अथवा न हो।
  • हालाँकि न्यायालय प्रत्येक समीक्षा याचिका पर विचार नही करता है। यह (न्यायालय) समीक्षा याचिका को तभी अनुमति देता है जब समीक्षा करने का कोई महत्त्वपूर्ण आधार दिखाता हो।

समीक्षा याचिका पर विचार करने के लिये न्यायालय द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया –

  • उच्चत्तम न्यायालय द्वारा निर्मित वर्ष 1996 के नियमों के अनुसार समीक्षा याचिका निर्णय की तारीख के 30 दिनों के भीतर दायर की जानी चाहिये।
  • कुछ परिस्थितियों में, न्यायालय समीक्षा याचिका दायर करने की देरी को माफ़ कर सकती है यदि याचिकाकर्ता देरी के उचित कारणों को अदालत के सम्मुख प्रदर्शित करे।
  • न्यायालय के नियमों के मुताबिक “वकीलों की मौखिक दलीलों के बिना याचिकाओं की समीक्षा की जाएगी।
  • समीक्षा याचिकाओं की सुनवाई उन न्यायधीशों द्वारा भी की जा सकती है जिन्होंने उन पर निर्णय दिया था।
  • यदि कोई न्यायाधीश सेवानिवृत्त या अनुपस्थित होता है तो वरिष्ठता को ध्यान में रखते हुए प्रतिस्थापन किया जा सकता है।

अपवाद : (जब न्यायालय मौखिक सुनवाई की अनुमति देता है) वर्ष 2014 के एक मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि “मृत्युदंड” के सभी मामलों की समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई तीन न्यायाधीशों की बेंच द्वारा खुली अदालत में की जाएगी।

समीक्षा याचिका के असफल हो जाने पर ?

  • यदि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समीक्षा याचिका को खारिज कर दिया जाता है तो भी सर्वोच्च न्यायालय से दोबारा समीक्षा करने का अनुरोध किया जा सकता है। इस प्रकार की याचिका को आरोग्यकर/सुधारात्मक याचिका अर्थात् क्यूरेटिव पिटीशन कहा जाता है।
  • वर्ष 2002 के रूपा हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार सुधारात्मक याचिका शब्दावली का प्रयोग किया।
  • एक समीक्षा याचिका को खारिज करने के बाद भी सर्वोच्च न्यायालय अपनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने और न्याय के सकल गर्भपात को रोकने के लिए एक उपचारात्मक याचिका पर विचार कर सकता है।
  • सुधारात्मक याचिका को सर्वोच्च न्यायालय में अनुच्छेद-142 के अंतर्गत दाखिल किया जा सकता है।

No Comments

Give a comment