प्रोटेम स्पीकर और फ्लोर टेस्ट

प्रोटेम स्पीकर और फ्लोर टेस्ट

चर्चा में क्यों ?

  • हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र विधानसभा में बिना गुप्त मतदान के फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दिया हैं।
  • फ्लोर टेस्ट के दौरान सबसे अहम भूमिका प्रोटेम स्पीकर की होगी क्योंकि मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस के इस्तीफा देने के साथ ही कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी सरकार बनने का रास्ता लगभग साफ हो गया।
  • विधायकों को शपथ दिलाने के लिए प्रोटेम स्पीकर के नाम पर विचार हुआ तत्पश्चात भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के विधायक कालिदास कोलंबकर को महाराष्ट्र प्रोटेम स्पीकर बनाया गया है।

प्रोटेम स्पीकर

  • प्रोटेम स्पीकर में प्रोटेम (Pro-tem) शब्द लैटिन भाषा के शब्द प्रो टैम्‍पोर (Pro Tempore) का संक्षिप्‍त रूप है। इस शब्द का अर्थ कुछ समय के लिए होता है।
  • प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति तब तक के लिए होती है जब तक विधानसभा अपना स्‍थायी विधानसभा अध्‍यक्ष (स्पीकर) नहीं चुन लेती।
  • विधानसभा में प्रोटेम स्‍पीकर की नियुक्ति उस राज्य का राज्यपाल करता है। वहीं लोकसभा के लिए प्रोटेम स्पीकर का चुनाव राष्ट्रपति करता है। सदन में सबसे वरिष्ठ सदस्य को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त किया जाता है।
  • संविधान में प्रोटेम स्पीकर की शक्तियों का जिक्र नहीं किया गया है।
  • यह प्रोटेम स्पीकर विधायकों को शपथ दिलवाता है। विधायकों के शपथ ग्रहण की पूरी प्रक्रिया प्रोटेम स्पीकर की देखरेख में ही होती है।
  • विधायकों के शपथ ग्रहण करने के बाद सदन के सदस्य स्थायी विधानसभा स्पीकर का चुनाव करते हैं।

फ्लोर टेस्ट

  • बहुमत सिद्ध करने के लिए फ्लोर टेस्ट की प्रक्रिया अपनाई जाती है। एस. आर. बोम्मई जजमेंट के बाद पहली बार ये प्रक्रिया अपनाई गई थी, उससे पहले विधायक और सांसद अपनी मर्जी से दल बदलते थे।
  • फ्लोर टेस्ट को सरकार द्वारा शुरू किए गए ऐसे प्रस्ताव ‘जिसमें यह जानने की कोशिश की जा सके कि क्या वह विधायिका का विश्वास हासिल करता है’ के रूप में में समझाया जा सकता है ।
  • इस प्रक्रिया में राज्यपाल द्वारा नियुक्त मुख्यमंत्री को विधान सभा के फर्श पर बहुमत साबित करने के लिए कहा जाएगा।

फ्लोर टेस्ट की प्रक्रिया ?

  • जब किसी राज्य की विधानसभा में फ्लोर टेस्ट करवाया जाता है, तो मुख्यमंत्री विश्वास मत हासिल करेंगे और साबित करेंगे कि उनके पास बहुमत का समर्थन है। अगर फ्लोर टेस्ट फेल होता है, तो मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना होगा।
  • फ्लोर टेस्ट का विचार संवैधानिक प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए भारत के संविधान में शामिल गया है।
  • विधायकों के शपथ लेने के बाद स्पीकर का चुनाव होता है और एक तरह से स्पीकर का चुनाव ही ये साबित कर देता है कि किस पार्टी के पास बहुमत है।
  • स्पीकर के चुनाव के बाद फ़्लोर टेस्ट की प्रक्रिया शुरू होती है, फ़्लोर टेस्ट में भी क्रॉस वोटिंग होती है।
  • सभी पार्टियां अपने विधायकों को एक व्हिप जारी करती हैं कि उन्हें किस पक्ष में वोट करना है यदि कोई विधायक इससे अलग वोट करता है तो वो अयोग्य हो सकता है।
  • सीक्रेट बैलेट के कारण तुरंत पता नहीं लगया जा सकता कि किसने किसको वोट किया लेकिन पार्टियां आंतरिक तौर पर जांच करती है।
  • यदि जांच में साबित होता है कि उनकी पार्टी के किसी विधायक ने क्रॉस वोट किया है तो उनकी दल-बदल कानून के तहत स्पीकर द्वारा अयोग्य साबित किया जा सकता है। एक बार विधायक अयोग्य हो जाए तो उन्हें दोबारा चुनाव लड़ना पड़ता है।

निष्कर्षतः महाराष्ट्र में ऐसी स्थिति में जहां किसी भी पार्टी के पास अकेले और गठबंधन में स्पष्ट बहुमत नहीं है तो फ्लोर टेस्ट करना ही एक मात्र तरीका  है, ताकि ये पता किया जा सके कि कितने विधायक किस पार्टी के साथ है।

एस.आर. बोम्मई
  • एस.आर. बोम्मई जनता पार्टी के बहुत वरिष्ठ नेता और कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे।
  • वर्ष 1988 में वो मुख्यमंत्री बने उस वक़्त केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और तात्कालीन राज्यपाल ने 1989 में उनकी सरकार को यह कारण बताते हुए बर्ख़ास्त कर दिया था कि उनकी सरकार के पास पर्याप्त बहुमत नहीं है। हालांकि, एस.आर. बोम्मई ने दावा किया था कि उनके पास पूरा बहुमत है।
  • उन्होंने राज्यपाल के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और दावा किया कि स्पष्ट बहुमत होने के बावजूद उनकी सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया गय।
  • इस पर लंबी सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला सुनाया था कि फ्लोर टेस्ट ही एकमात्र ऐसा तरीका है जिससे एस.आर. बहुमत सिद्ध कर पाएंगे।

Comments ( 5 )

  • CHAMPA LAL

    Nice opinions sir

    • CHAMPA LAL

      Bhut achha

  • CHAMPA LAL

    Nice opinions sir ji

  • CHAMPA LAL

    Sir aapki yah planning good h

  • Manish Saini

    Superb

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