भारत के राज्यों में राष्ट्रपति शासन – Utkarsh Classes

भारत के राज्यों में राष्ट्रपति शासन

भारत के राज्यों में राष्ट्रपति शासन

चर्चा में क्यों ?

  • हाल ही में अविभाजित जम्मू कश्मीर राज्य से राष्ट्रपति शासन समाप्त किया गया है।
  • महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नही मिलने के कारण हाल ही में वहाँ राष्ट्रपति शासन लगाने की चर्चा हो रही है।

राष्ट्रपति शासन –

  • भारतीय संविधान के भाग 18 में आपात उपबंधों को तीन भागों में बाँटा गया है- राष्ट्रीय आपात (अनुच्छेद-352), राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता/राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद-356) और वित्तीय आपात (अनुच्छेद-360)। संविधान में इसके लिये ‘आपात की उद्घोषणा‘ शब्द का प्रयोग हुआ है।
  • राज्‍य में संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने की स्थिति से उत्‍पन्‍न परिस्थिति के लिए राष्‍ट्रपति शासन का प्रावधान है। संविधान में इसके लिये कहीं भी आपात या आपातकाल शब्द का उल्‍लेख नहीं मिलता है। अनुच्छेद 356 के तहत  राष्ट्रपति शासन के बारे में प्रावधान दिए गए हैं।
  • अनुच्‍छेद 356 के अनुसार यदि राष्‍ट्रपति को यह समाधान/ज्ञात/ हो जाता है कि ऐसी स्थिति उत्‍पन्‍न हो गई है जिसमें राज्‍य का शासन संवैधानिक उपबंधों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता है। राष्‍ट्रपति को यह समाधान राज्‍यपाल की रिपोर्ट के आधार पर भी हो सकता है और अन्‍यथा भी। संविधान में इस स्थिति कोसंवैधानिक तंत्र का विफल हो जाना के रूप में परिभाषित किया गया है।
  • यदि संसद के दोनों सदनों द्वारा राष्ट्रपति शासन का अनुमोदन कर दिया जाता है तो राष्ट्रपति शासन 6 माह तक चलता रहेगा. इस प्रकार 6-6 माह करके इसे 3 वर्ष तकबढ़ाया जा सकता है।
  • भारत में राष्ट्रपति शासन सबसे पहले पंजाब में 1951 में लगाया गया था। भारत में सबसे अधिक बार राष्ट्रपति शासन केरल और उत्तर प्रदेश में 9-9 बार लगाया गया है। इसके बाद पंजाब में 8 बार जबकि बिहार और मणिपुर में 7 -7 बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया है।
  • भारत में 1950 से 2019 तक 125 से अधिक बार राष्ट्रपति शासन लगाया जा चुका है।
  • सामान्‍य परिस्थितियों में भारतीय संविधान परिसंघात्‍मक ढॉंचे का अनुसरण करता है परन्‍तु यदि देश की सुरक्षा खतरे में हो या उसकी एकता और अखण्‍डता को खतरा हो, तो यह ढॉंचा परेशानी का कारण भी बन सकता है। ऐसी परिसस्‍थतियों में देश की रक्षा के लिये परिसंघ के सिद्धातों को त्‍याग दिया जाता है और आपात उपबंधों  का प्रावधान किया गया है। लेकिन जैसे ही देश की परिस्थितियॉं सामान्‍य होती हैं, संविधान पुन: अपने सामान्‍य रूप में कार्य करने लगता है।

किन परिस्थितियों में राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाना उचित है –

  • यदि चुनाव के बाद किसी पार्टी को बहुमत न मिला हो या जिस पार्टी को बहुमत मिला हो वह सरकार बनाने से इनकार कर दे और राज्यपाल को दूसरा कोई ऐसा गठबंधन न मिले जो सरकार बनाने की हालत में हो।
  • यदि राज्य सरकार विधानसभा में हार के बाद इस्तीफा दे दे और दूसरे दल सरकार बनाने के इच्छुक या ऐसी हालत में न हों।
  • यदि राज्य सरकार ने केंद्र सरकार के संवैधानिक निर्देशों का पालन न किया हो या यदि राज्य सरकार अपने संवैधानिक दायित्यों का निर्वाह न कर रही हो।
  • यदि कोई राज्य सरकार जान-बूझकर आंतरिक अशांति को बढ़ावा या जन्म दे रही हो।

किपरिस्थितियों में राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाना अनुचित है –

  • यदि राज्य सरकार विधानसभा में बहुमत न मिलने के बाद इस्तीफा दे दे और राज्यपाल बिना किसी अन्य संभावना को तलाशे राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुशंसा कर दे/ बहुमत सिद्ध करने का मौका दिये बिना राज्यपाल सिर्फ अपने अनुमान के आधार पर प्रदेश में तलाशे राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुशंसा कर दे ।
  • यदि राज्य में सरकार चलाने वाली पार्टी लोकसभा के चुनाव में बुरी तरह हार जाये। (जैसा कि जनता पार्टी सरकार ने आपातकाल के बाद 9 राज्य सरकारों को बर्खास्त करके किया था और इंदिरा सरकार ने उसके बाद इतनी ही सरकारों को बर्खास्त करके किया था)

अदालत की भूमिका –

1975 में आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी सरकार ने 38वें संविधान संशोधन के जरिये अदालतों से राष्ट्रपति शासन की न्यायिक समीक्षा का अधिकार छीन लिया था। बाद में जनता पार्टी की सरकार ने 44वें संविधान संशोधन के जरिये उसे फिर से पहले जैसा कर दिया। बोम्मई मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक समीक्षा के लिए कुछ प्रमुख  प्रावधान तय किये।

  • राष्ट्रपति शासन लगाये जाने की न्यायिक समीक्षा अदालत द्वारा की जा सकती है।
  • सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट राष्ट्रपति शासन को खारिज कर सकता है यदि उसे लगता है कि इसे सही कारणों से नहीं लगाया गया।
  • राष्ट्रपति शासन लगाने के औचित्य को सही ठहराने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है और उसके द्वारा ऐसा न कर पाने की हालत में कोर्ट राष्ट्रपति शासन को असंवैधानिक और अवैध करार दे सकता है।
  • अदालत राष्ट्रपति शासन को असंवैधानिक और अवैध करार देने के साथ-साथ बर्खास्त, निलंबित या भंग की गई राज्य सरकार को बहाल कर सकती है, जैसा उत्तराखंड में हरीश रावत की सरकार के मामले में किया था।

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