जलियाँवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक

जलियाँवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक

क्यों रहा चर्चा में ?

  • हाल ही में राज्यसभा द्वारा जलियाँवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक (संशोधन) विधेयक [ Jallianwala Bagh National Memorial (Amendment) Bill] , 2019 को मंजूरी दी गई है। 
  • विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए संस्कृति मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल ने कहा कि “सरकार का इरादा एक स्मारक बनाने का है ताकि आने वाली पीढ़ियों द्वारा शहीदों के बलिदान को याद किया जाए”। 

ध्यातव्य बिंदु

  • इस विधेयक को लोकसभा द्वारा 2 अगस्त, 2019 को पारित कर दिया गया था, इसलिए अब इस विधेयक को संसद ( दोनों सदनों ) द्वारा पारित किया गया माना जाएगा।
  • वर्ष 2019 में इस घटना के 100 साल बीत जाने के बाद यह आवश्यक है कि जलियाँवाला बाग स्मारक को राष्‍ट्रीय स्‍मारक के रूप में स्थापित किया जाए।
  • यह विधेयक जलियाँवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक अधिनियम,1951 में संशोधन का प्रावधान करता है।

विधेयक में प्रावधान 

  • जलियाँवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक अधिनियम, 1951 के अनुसार इस स्मारक के न्यासियों में प्रधानमंत्री (अध्यक्ष के रूप में) , भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष, संस्कृति मंत्रालय का प्रभारी मंत्री, लोकसभा में विपक्ष का नेता, पंजाब का राज्यपाल, पंजाब का मुख्यमंत्री और केंद्र सरकार द्वारा नामित तीन प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल थे। 
  • लेकिन इस विधेयक में भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस के अध्‍यक्ष को न्‍यास का स्थायी सदस्य बनाए जाने से संबंधित धारा को हटाकर गैर राजनीतिक व्यक्ति को इसके संचालन हेतु न्‍यासी बनाने का प्रावधान किया गया है।
  • विधेयक में यह संशोधन भी किया गया है कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष अथवा विपक्ष का ऐसा कोई नेता न होने की स्थिति में सदन में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को न्‍यास के सदस्य के रूप में शामिल किया जाएगा।
  • विधेयक यह भी प्रावधान करता है कि केंद्र सरकार द्वारा नामित तीन न्यासियों को पाँच वर्ष की अवधि के लिये नियुक्त किया जाएगा तथा इन्हें पुनः नामित भी किया जा सकता है।
  • इस विधेयक के अनुसार नामित न्‍यासी को पाँच साल की अवधि समाप्त होने से पहले भी केंद्र सरकार द्वारा हटाया जा सकता है।

जलियाँवाला बाग हत्याकांड –

  • 9/10 अप्रैल, 1919 को रौलेट एक्ट (काला कानून प्रस्ताव) का विरोध करने के आरोप में पंजाब के दो लोकप्रिय नेता डॉ. सत्यपाल एवं डॉ. सैफुद्दीन किचलू को सरकार ने गिरफ्तार कर लिया।
  • 13 अप्रैल को सैफुद्दीन किचलू और सत्यपाल की गिरफ्तारी के विरोध में बैशाखी के दिन अमृतसर के जलियाँवाला बाग में लोगों की सभा आयोजित हुई। जनरल डायर द्वारा सभा आयोजित करने को अपने आदेश की अवहेलना माना गया तथा सभास्थल पर पहुँचकर निहत्थे लोगों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। यह घटना ब्रिटिश हुकूमत के काले अध्‍यायों में से एक है जिसे जालियाँवाला बाग हत्याकांड के नाम से जाना जाता है। 
  • इस नृसंहार में मरने वालों की संख्या के आंकड़े भिन्न है – 
  • ब्रिटिश राज के अभिलेख इस घटना में 200 लोगों के घायल होने और 379 लोगों के शहीद होने की बात स्वीकार करते है जिनमें से 337 पुरुष, 41 नाबालिग लड़के और एक 6-सप्ताह का बच्चा था।
  • अनाधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 1000 से अधिक लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए। 
  • इसके विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदान की गई ‘नाइटहुड’ की उपाधि त्याग दी थी।
  • इस हत्याकांड की जाँच के लिये कॉन्ग्रेस ने मदन मोहन मालवीय की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की और ब्रिटिश सरकार ने इस हत्याकांड की जाँच के लिये हंटर आयोग गठित किया था।
रोलेट एक्ट ( काला कानून प्रस्ताव ) मार्च, 1919
  • ब्रिटिश सरकार ने 1916 में न्यायाधीश सिडनी रौलेट की अध्यक्षता में एक समिति गठित की, जिसे आतंकवाद को कुचलने के लिए एक प्रभावी योजना का निर्माण करना था।
  • इस समिति के द्वारा लगभग 4 महीनों तक खोज की गई औररौलेट समिति की एक रिपोर्ट में भारत के जाबाज देशभक्तों द्वारा स्वतंत्रता के लिए किये गए बड़े-बड़े और छोटे आतंकपूर्ण कार्यों को बढ़ा-चढ़ाकर, बड़े उग्र रूप में प्रस्तुत किया गया था।
  • रौलेट कमेटी के सुझावों के आधार पर फरवरी 1918 में केंद्रीय विधान परिषद में दो विधेयक पेश किए गए। इनमें से एक विधेयक परिषद के भारतीय सदस्यों के विरोध के बाद भी पास कर दिया गया।
  • रौलेट एक्ट (काला कानून प्रस्ताव) मार्च, 1919 (The Anarchical and Revolutionary Crime Act, 1919) में भारत की ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में उभर रहे राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने के उद्देश्य से निर्मित (सर सिडनी रौलेट की अध्यक्षता वाली सेडिशन समिति की शिफारिशों के आधार पर) कानून था। 
  • इस कानून के अनुसार
  1. ब्रिटिश सरकार को यह अधिकार प्राप्त हो गया था कि वह किसी भी भारतीय पर अदालत में बिना मुकदमा चलाए उसे जेल में बंद कर सके। 
  2. इस क़ानून के तहत अपराधी को उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने वाले का नाम जानने का अधिकार भी समाप्त कर दिया गया था।
  3. इस कानून के विरोध में देशव्यापी हड़तालें, जूलूस और प्रदर्शन होने लगे। ‍
  • रौलेट एक्ट के विरोध में गांधीजी के द्वारा व्यापक हड़ताल का आह्वानकिया गया यह राष्ट्रीय स्तर का प्रथम आंदोलन था। तत्पश्चात 24 फरवरी 1919 के दिन गांधीजी ने मुंबई में एक “सत्याग्रह सभा”का आयोजन किया था और इसी सभा में तय किया गया और कसम ली गई कि रौलेट एक्ट का विरोध ‘सत्य’और ‘अहिंसा’ के मार्ग पर चलकर किया जाएगा। गांधीजी के इस सत्य और अहिंसा के मार्ग का विरोध भी कुछ सुधारवादी नेताओं की ओर से किया गया था, जिसमें सर डि.वादी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, तेज बहादुर सप्रू, श्री निवास शास्त्री जैसे नेता शामिल थे। किन्तु उस गांधीजी को बड़े पैमाने पर होमरूल लीग के सदस्यों का समर्थन मिला था।

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