मैंग्रोव वनों का घटता क्षेत्र

मैंग्रोव वनों का घटता क्षेत्र

चर्चा में क्यों ?

  • हाल ही में बंगाल की खाड़ी में आए चक्रवात ‘बुलबुल’ से बचाव में मैंग्रोव वनों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई किंतु मैंग्रोव वनों का घटता क्षेत्रफल जैव पारिस्थितिकी के लिये एक चिंता का विषय है।
  • पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, 110 से 135 किलोमीटर/घंटा की रफ़्तार से चलने वाली चक्रवाती हवाओं से सुंदरबन को बचाने में मैंग्रोव वनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इनकी अनुपस्थिति में यह चक्रवात खतरनाक साबित हो सकता था।

चक्रवात ‘बुलबुल’ के प्रभाव –

  • भारतीय सुंदरबन क्षेत्र में पड़ने वाले सागर द्वीप (Sagar Island) में बुलबुल चक्रवात (Bulbul Cyclone) की वजह से भारी लैंडफॉल हुआ, इसके अलावा वहाँ के मछुआरों तथा उनकी नावों को काफी नुकसान हुआ है।
  • परंतु इसी बीच कलश द्वीप (Kalash Island) पर फँसे कुछ पर्यटक इसलिये सुरक्षित बचे क्योंकि उन्होंने वहाँ स्थित मैंग्रोव क्षेत्र में शरण ली।
  • ‘जादवपुर विश्वविद्यालय’ द्वारा किये गए एक अध्ययन में बताया गया है कि लगभग 10,000 वर्ग किमी. मैंग्रोव क्षेत्र, जो लाखों लोगों के भोजन, पानी और वन उत्पादों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, के लिये जलवायु परिवर्तन एक खतरा उत्पन्न कर रहा है।
  • आम तौर पर नदियों द्वारा लाई गई तलछट, यहाँ अवस्थित द्वीपों के क्षेत्रफल में वृद्धि करती थी, अब यह तलछट नदियों पर बनाए जा रहे बाँधों द्वारा रोक ली जाती है। फलस्वरूप द्वीपों के क्षेत्रफल में कमी के साथ ही मैंग्रोव वनों के क्षेत्रफल में भी कमी देखी जा रही है।

मैंग्रोव क्या है ?

  • ये छोटे पेड़ या झाड़ी होते हैं जो समुद्र तटों, नदियों के मुहानों पर स्थित ज्वारीय, दलदली भूमि पर पाए जाते हैं। मुख्यतः खारे पानी में इनका विकास होता है।
  • इस शब्द का इस्तेमाल उष्णकटिबंधीय तटीय वनस्पतियों के लिये भी किया जाता है, जिसमें ऐसी ही प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
  • मैंग्रोव वन मुख्यतः 25 डिग्री उत्तर और 25 डिग्री दक्षिणी अक्षांशों के मध्य उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में पाये जाते हैं।
  • भारत में सुंदरबन का क्षेत्र 9,630 वर्ग किमी. में फैला हुआ है जिसमें 4,263 वर्ग किमी. में मैंग्रोव विद्यमान है।
  • यह दम्पियर-हॉज़स रेखा (Dampier-Hodges line) के दक्षिण में पश्चिम बंगाल के उत्तरी तथा दक्षिणी चौबीस परगना जिलों में स्थित है।

दम्पियर-हॉज़स रेखा (Dampier-Hodges line)

  • यह एक काल्पनिक रेखा है जिसका निर्माण वर्ष 1829-30 में सुंदरबन डेल्टा के उत्तरी सीमा के निर्धारण के लिये किया गया था। यह पश्चिम बंगाल के उत्तरी तथा दक्षिणी चौबीस परगना ज़िलों में स्थित है।

दोहन का कारण –

  • हाल ही में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal-NGT) ने मैंग्रोव वनों के दोहन की जाँच करने के लिये एक समिति का गठन किया जिसमें पाया गया कि पश्चिम बंगाल सरकार ने बंगलर आबास (Banglar Abas) नामक योजना में घरों के वितरण के लिये मैंग्रोव वनों की कटाई की।
  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (ISRO) द्वारा सैटेलाइट से लिये गए आँकड़ों से प्राप्त जानकारियों के अनुसार, फरवरी 2003 से फरवरी 2019 के मध्य 9990 हेक्टेयर भूमि का अपरदन हुआ है। इसके अलावा 71 प्रतिशत मैंग्रोव तथा अन्य वनों का ह्रास हुआ है।
  • मैंग्रोव वनों का दोहन न सिर्फ एक्वाकल्चर के लिये बल्कि तटबंधों तथा मानवीय आवासों के लिये भी हुआ है।

संरक्षण के उपाय –

  • सुंदरबन के कुछ हिस्सों को कानूनी तौर पर राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों (विशेष रूप से बाघ संरक्षण) के रूप में संरक्षित किया गया है।
  • वैज्ञानिकों ने नीदरलैंड की तर्ज़ पर समुद्रतटीय मृदा के कटाव को रोकने हेतु डाइकों (Dikes) के निर्माण का सुझाव दिया है।
  • सुंदरबन को रामसर कन्वेंशन के अंतर्गत शामिल किया जाना एक सकारात्मक कदम है। यह कन्वेंशन नमभूमि (Wetlands) और उनके संसाधनों के संरक्षण तथा बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग के लिये राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का ढाँचा उपलब्ध कराता है।
  • सुभेद्यता के अनुसार सुंदरबन को विभिन्न उपक्षेत्रों में विभाजित कर प्रत्येक के लिये एक निर्देशित समाधान कार्यक्रम अपनाया जाना चाहिये।
  • इस क्षेत्र में नदियों के अलवणीय जल की मात्रा में वृद्धि के उपाय किये जाने चाहिये।

मानवीय कारणों से होने वाले निम्नीकरण को रोकने के लिये

  • स्थानीय समुदायों को जागरूक करना एवं उनकी समस्याओं के लिये वैकल्पिक समाधानों को लागू करना।
  • सामान्य पर्यटन की जगह जैव-पर्यटन (Eco-Tourism) को बढ़ावा देना।
  • वनोन्मूलन (Deforestration) पर रोक एवं वनीकरण को बढ़ावा देना।
  • संकटग्रस्त जीवों एवं वनस्पतियों की सुरक्षा को बढ़ावा देना।
  • जैव-तकनीक के माध्यम से मैंग्रोव का संरक्षण एवं पुनर्स्थापन।

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