NPA से निपटने के लिए RBI का क्लॉबैक मैकेनिज्म – Utkarsh Classes

NPA से निपटने के लिए RBI का क्लॉबैक मैकेनिज्म

NPA से निपटने के लिए RBI का क्लॉबैक मैकेनिज्म

चर्चा में क्यों ?

  • भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने गैर निष्पादित संपत्ति (NPA) से निपटने के लिये निजी बैंकों को क्लॉबैक मैकेनिज्म (Clawback mechanism) के प्रावधान को लागू करने का निर्देश दिया है।

क्लॉबैक मैकेनिज्म

  • कंपनियाँ मुख्य प्रबंधन कार्मिक (Key Management Personnel- KMP) और भागीदारों के हितों को आगे बढ़ाने तथा कंपनी के दीर्घकालिक हितों के साथ इनको समायोजित करने के लिये दो प्रकार की नीतियाँ- क्लॉबैक मैकेनिज्म और मेलूस क्लॉज बनाती है।
  • कर्मचारी और बैंक के बीच एक संविदात्मक समझौता होता है जिसमें कर्मचारी कुछ परिस्थितियों में बैंक को पहले भुगतान या निहित पारिश्रमिक वापस करने के लिए सहमत होता है।
  • इस प्रकार के प्रावधान का उद्देश्य पूर्णकालिक निदेशकों और CEO के परिवर्तनीय भुगतान हेतु मानदंड निर्धारित करना है।

मेलूस क्लॉज

  • मेलूस क्लॉज के तहत कंपनी के कर्मचारियों के आवश्यक पारिश्रमिक या परिवर्तनीय भुगतान में कटौती की जाती है।
  • यह एक प्रकार की गैर-प्रोत्साहन व्यवस्था है, जहाँ कुछ या सभी प्रदर्शन आधारित पारिश्रमिक प्राप्त नहीं होते हैं।
  • RBI के अनुसार मेलूस क्लॉज के तहत बैंक को सभी को छूट देने वाले पारिश्रमिक की राशि के हिस्से को रोकने अर्थात् परिवर्तनीय भुगतान की राशि में कटौती की जाती है।

वर्तमान प्रावधान –

  • कई निजी बैंकों द्वारा अपनी गवर्नेंस से संबंधित रिपोर्ट में NPA से संबंधित आंकड़ों को ठीक प्रकार से स्पष्ट नहीं किया गया। बैंकों में NPA की स्थिति के बावज़ूद उनके CEO (Chief Executive Officer) और पूर्णकालिक निदेशकों को वर्ष दर वर्ष उच्च परिवर्तनीय भुगतान दिया गया।
  • इस प्रकार की कॉर्पोरेट गवर्नेंस की कुप्रबंधन की स्थिति से निपटने हेतु RBI द्वारा परिवर्तनीय भुगतान पर लागू होने वाले मेलूस क्लॉज (Malus Clause) और क्लॉबैक मैकेनिज्म की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है।

RBI के दिशा-निर्देश –

  • मूल्यांकित NPA या परिसंपत्ति वर्गीकरण सार्वजनिक प्रकटीकरण की निर्धारित सीमा से अधिक होने की स्थिति में, बैंक को उस मूल्यांकन वर्ष का परिवर्तनीय भुगतान (पूर्णकालिक निदेशकों और CEO का)मेलूस क्लॉज के तहत रोक देना चाहिये।
  • यदि गारंटीकृत बोनस (Guaranteed Bonus) जोखिम प्रबंधन या भुगतानों आधारित प्रदर्शन (Pay for Performance) के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है तो उन्हें क्षतिपूर्ति योजना (Compensation Plan) का हिस्सा नहीं बनाना चाहिये। इसके अतिरिक्त गारंटीकृत बोनस केवल नए कर्मचारियों (केवल पहले वर्ष तक सीमित) को ही प्रदान किया जाना चाहिये।
  • परिवर्तनीय भुगतान के मानकों में से कम से कम 50%; वैयक्तिक (Individual), व्यवसाय-इकाई (Business-Unit) और फर्म-वाइड (Firm-Wide) जैसे मानकों का समावेश किया जाना चाहिये।
  • कुल परिवर्तनीय भुगतान निर्धारित वेतन के अधिकतम 300% तक सीमित किया जाना चाहिये।
  • परिवर्तनीय भुगतान निर्धारित भुगतान (Fixed Pay) से 200% से अधिक होने पर कम-से-कम 67% भुगतान नॉन-कैश इंस्ट्रूमेंट्स (Non-Cash Instrument) के जरिये दिया जाना चाहिये।
  • परिवर्तनीय भुगतान को 150% तक कैप किया जा सकता है लेकिन इसे निर्धारित वेतन से 50% से कम नहीं किया जा सकता है।

गैर निष्पादित संपत्ति या NPA –

  • एक गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) को एक क्रेडिट सुविधा के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसके संबंध में मूल अवधि के लिए मूलधन का ब्याज या किस्त ‘अतीत के कारण’ बना हुआ है। साधारण शब्दों में, किसी संपत्ति को गैर-निष्पादित के रूप में टैग किया जाता है जब वह ऋणदाता के लिए आय उत्पन्न करना बंद कर देता है।
  • गैर-निष्पादनकारी परिसंपत्तियों से तात्पर्य ऐसे ऋण से है, जिसका लौटना संदिग्ध हो। बैंक अपने ग्राहकों को जो ऋण देता है वह उसे अपने खाते में संपत्ति के रूप में दर्ज करता है, परन्तु यदि किसी कारणवश बैंक को यह आशंका होती है कि ग्राहक यह ऋण नहीं लौटा पाएगा, तो ऐसी संपत्ति को ही गैर-निष्पादनकारी संपत्तियाँ कहा जाता है।
  • यह किसी भी बैंक की वित्तीय अवस्था को मापने का पैमाना है। यदि इसमें वृद्धि होती है, तो यह बैंक के लिये चिंता का विषय बन जाता है।
  • गैर-निष्पादनकारी परिसंपत्तियाँ (non-performing assets-NPA) किसी भी अर्थव्यवस्था के लिये बोझ होती हैं। ये देश की बैंकिंग व्यवस्था को रुग्ण बनाती हैं। गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों से ‘बैड लोन’ और ‘बैड एसेट’ (ख़राब परिसम्पत्तियाँ) में बेतहाशा वृद्धि हुई है। विदित हो कि ‘गैर-निष्पादनकारी परिसंपत्तियाँ’, बैड लोन और बैड एसेट से ही मिलकर बनती हैं।

एनपीए का प्रबंधन

  • यदि लेनदारों द्वारा तय समय पर ऋण नहीं चुकाया जाता है, तो बैंक ऋण के बदले गिरवी रखी गई संपत्ति को ज़ब्त कर सकता है और फिर उस संपत्ति को बेच सकता है।
  • एनपीए की गंभीर होती समस्या के समाधान के लिये भारतीय रिजर्व बैंक ने सामरिक ऋण पुनर्गठन (Strategic Debt Restructuring-SDR) योजना शुरू की थी।
  • एसडीआर के तहत, यदि कोई कंपनी या संस्था ऋण नहीं चुका पा रही है, तो उस डिफॉल्टर कंपनी के प्रबंधन में बैंक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
  • यहाँ तक कि एसडीआर योजना के तहत बैंक, कंपनी के प्रमोटरों को भी बदल सकते हैं। बैंक, बैड लोन का पुनर्गठन भी कर सकते हैं, जिससे कि लेनदारों को उधार चुकाना थोड़ा आसान हो जाए। बैंक, गैर-निष्पादनकारी परिसंपत्तियों को डिस्काउंट पर परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनियों को बेचकर भी स्वयं का ऋण चुकता कर सकते हैं।

एनपीए के प्रबंधन में आने वाली समस्याएँ

  • परिसंपत्तियों के जब्ती के माध्यम से स्वयं का ऋण चुकता करना बैंकों के लिये प्रायः फायदेमंद नहीं होता, क्योंकि जब्त की गई परिसंपत्तियों को प्रायः कम दाम पर बेचना पड़ता है, जो कि दिये गए ऋण की तुलना में बहुत ही कम होती है।
  • गैर-निष्पादनकारी परिसंपत्तियों के पुनर्गठन में दो समस्याएँ आती हैं-
  1. हो सकता है बैंक के प्रबंधक अवैध तरीके से कुछ कंपनियों की गैर-निष्पादनकारी परिसंपत्तियों का मूल्य बहुत ही कम कर दें, ताकि वे अवैध लाभ कमा सकें।
  2. यदि गैर-निष्पादनकारी परिसंपत्तियों को डिस्काउंट दर पर बेचा जाता है, तो सीधे इसका प्रतिकूल प्रभाव बैंकों के लाभांश पर देखने को मिलेगा।

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