तीसरा आरसीईपी (RCEP) शिखर सम्मेलन

तीसरा आरसीईपी (RCEP) शिखर सम्मेलन

चर्चा में क्यों ?

  • भारत सरकार ने 16 सदस्यीय देशों वाले क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (Regional Comprehensive Economic Partnership-RCEP) समूह में शामिल न होने का निर्णय लिया है।
  • RCEP से जुड़ी भारत की चिंताओं को तमाम वार्ताओं के बाद भी दूर नहीं किया जा सका, जिसके कारण भारत को यह निर्णय लेना पड़ा।
  • भारत के अतिरिक्त अन्य सभी 15 देश वर्ष 2020 तक मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे।
  • तीसरे RCEP का आयोजन 31 अक्टूबर से 3 नवंबर तक थाईलैंड हुआ।

क्या है RCEP ?

  • क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी या RCEP एक मुक्त व्यापार समझौता है, जो कि 16 देशों के मध्य किया जा रहा था। उल्लेखनीय है कि भारत के इसमें शामिल न होने के निर्णय के पश्चात् अब इसमें 15 देश शेष हैं।
  • इसकी औपचारिक शुरुआत नवंबर, 2012 में कंबोडिया में आयोजित आसियान शिखर सम्मेलन में की गई थी।
  • पहले इसमें 10 आसियान देश तथा उनके FTA भागीदार- भारत, चीन, जापान, द. कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड शामिल थे।
  • RCEP का उद्देश्य व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिये इसके सदस्य देशों के बीच व्यापार नियमों को उदार बनाना एवं सभी 16 देशों में फैले हुए बाज़ार का एकीकरण करना है। इससे सभी सदस्य देशों के उत्पादों और सेवाओं का संपूर्ण क्षेत्र में पहुँचना आसान होगा।
  • RCEP समझौते में वस्तुओं एवं सेवाओं का व्यापार, निवेश, आर्थिक और तकनीकी सहयोग, बौद्धिक संपदा, प्रतिस्पर्द्धा, विवाद निपटान तथा अन्य मुद्दे शामिल हैं।
  • इस समझौते के वर्ष 2020 तक संपन्न होने की उम्मीद है।

क्या कारण है कि भारत RCEP में शामिल नहीं हुआ ?

  • भारत के अतिरिक्त RCEP में भाग लेने वाले अन्य सभी 15 सदस्यों ने मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने का निर्णय लिया है। दूसरी ओर भारत ने कुछ अनसुलझे मुद्दों के कारण इस समझौते में शामिल न होने का निर्णय लिया है।
  • भारतीय प्रधानमंत्री ने कहा कि “RCEP अपने मूल उद्देश्यों को प्रतिबिंबित नहीं करता एवं इसके परिणाम न तो उचित हैं और न ही संतुलित।”
  • RCEP वार्ता के दौरान कई भारतीय उद्योग समूहों ने इस समझौते पर हस्ताक्षर करने को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने तर्क दिया था कि कुछ घरेलू क्षेत्र अन्य प्रतिभागी देशों के सस्ते विकल्पों के कारण प्रभावित हो सकते हैं। उदाहरण के लिये समझौते के फलस्वरूप देश के डेयरी उद्योग को ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड से कड़ी प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ेगा। इसी प्रकार देश के इस्पात और कपड़ा उद्योग को भी कड़ी प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ेगा।
  • कई भारतीय उद्यमियों ने चिंता ज़ाहिर की थी कि यदि चीन जैसे देशों के सस्ते उत्पादों को भारतीय बाज़ार में आसान पहुँच प्राप्त हो जाएगी तो भारतीय घरेलू उद्योग पूर्णतः तबाह हो जायेंगे।
  • ज्ञात हो कि भारत ऐसे ऑटो-ट्रिगर तंत्र की मांग कर रहा था जो उसे ऐसे उत्पादों पर शुल्क बढ़ाने की अनुमति देगा जहाँ आयात एक निश्चित सीमा को पार कर चुका हो।

भारत के अनसुलझे मुद्दे –

भारत पहले से ही 16 RCEP देशों के साथ व्यापार घाटे की स्थिति में है। अपने बाज़ार को और अधिक मुक्त बनाने से स्थिति और बिगड़ सकती है। गौरतलब है कि चीन के साथ भारत का कुल व्यापार 50 बिलियन डॉलर से भी अधिक का है।

  • इस व्यापार संधि में शामिल होने की भारत की अनिच्छा इस अनुभव से भी प्रेरित है कि भारत को कोरिया, मलेशिया और जापान जैसे देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों का कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ है।
  • समझौतों का कार्यान्वयन शुरू होने के बाद इन देशों से भारत के आयात में तो वृद्धि हुई लेकिन भारत से निर्यात में उस गति से वृद्धि नहीं हुई और इससे देश का व्यापार घाटा बढ़ा।
  • गैर टैरिफ बाधाओं संबंधी भारत की चिंता और बाज़ार तक अधिक पहुँच की मांग को लेकर भी भारत को कोई विश्वसनीय आश्वासन नहीं दिया गया।
  • भारत ने कई बार उत्पादों पर टैरिफ को कम करने अथवा समाप्त करने के संबंध में अपना डर ज़ाहिर किया था।
  • RCEP में ‘रूल्स ऑफ ओरिजिन’ (Rules of Origin) के दुरुपयोग से संबंधित भारतीय चिंताओं को भी सही ढंग से संबोधित नहीं किया गया।
  • किसी उत्पाद के राष्ट्रीय स्रोत को निर्धारित करने के लिये उपयोग किये जाने वाले मानदंड को ‘रूल्स ऑफ ओरिजिन’ कहा जाता है।
  • RCEP समझौते में टैरिफ घटाने के लिये वर्ष 2013 को आधार वर्ष के रूप में चुनने का प्रस्ताव किया गया है, परंतु भारत इसके विरोध में है क्योंकि बीते कुछ वर्षों में कपड़ा और इलेक्ट्रॉनिक जैसे कई उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ा है और इसलिये भारत चाहता है कि वर्ष 2019 को आधार वर्ष के रूप में चुना जाए।

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