स्वास्थ्य सेवाओं पर नीति आयोग की रिपोर्ट

स्वास्थ्य सेवाओं पर नीति आयोग की रिपोर्ट

क्या है खबर?

नीति आयोग ने राज्यों में स्वास्थ्य की स्थिति को दर्शाते हुए ‘स्वास्थ्य राज्य, प्रगतिशील भारत’ नाम की रिपोर्ट जारी की है जो इस प्रकार की नीति आयोग द्वारा लगातार दूसरी रिपोर्ट है।

क्या है रिपोर्ट के मुख्य बिंदु ?

  • नीति आयोग ने तेईस संकेतकों को आधार बनाकर राज्यों की एक सूची तैयार की है।
  • ये संकेतक जीवन को स्वस्थ बनाने तथा उसे सहेजने से जुड़ी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं के सूचक है।
  • इनमें नवजात मृत्यु दर, प्रजनन दर, लिंगानुपात, स्वास्थ्य सेवाओं की संचालन व्यवस्था, अधिकारियों की नियुक्ति और अवधि के साथ ही नर्सों और डॉक्टरों के खाली पदों के मुद्दे भी शामिल किए गए है।
  • रिपोर्ट को तीन हिस्सों बड़े राज्य (21), छोटे राज्य (8) व केन्द्रशासित प्रदेशों (8) में बाँट कर बनाया गया है।
  • बड़े राज्यों में केरल आंधप्रदेश तथा महाराष्ट्र का पद्रर्शन अच्छा है जबकि उत्तरप्रदेश, बिहार तथा उड़ीसा की भूमिका सबसे निराशाजनक है।
  • बड़े राज्यों में हरियाणा, राजस्थान तथा झारखण्ड ने पिछले वर्ष की तुलना में अच्छा सुधार किया है।
  • छोटे राज्यों में मिजोरम, मणिपुर और त्रिपुरा का प्रदर्शन अच्छा है और इन प्रदेशों ने सुधार भी किया है।
  • केन्द्रशासित प्रदेशों में चंडीगढ़, दादरा एवं नागर हवेली का प्रदर्शन अच्छा है।
  • इस रिपोर्ट को केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण
  • मंत्रालय, विश्व बैंक तथा नीति आयोग ने मिलकर तैयार किया है।

क्या है भारत स्वास्थ्य उपलब्धता में स्थिति?

  • इस रिपोर्ट के मुताबिक 61000 लोगाें पर केवल एक सरकारी अस्पताल उपलब्ध है और 1833 लोगों पर केवल एक बिस्तर उपलब्ध है।
  • रिपोर्ट के मुताबिक आबादी के हिसाब से देखें तो हम विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों से बहुत पीछे है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रति 10,000 की आबादी पर पच्चास बिस्तर और 25 चिकित्सक होने चाहिए जबकि भारत में प्रति 10,000 आबादी पर नौ बिस्तर व सात चिकित्सक हैं।
  • स्वास्थ्य सेवाअों की स्तरीय स्थिति के मामले में भारत विकसित देशों से पीछे है ही, कई विकासशील देशों से भी बराबरी नहीं कर पा रहा है।
  • स्वास्थ्य सेवाअों से जुड़े अधिकतर मानकों पर हम दुनिया के देशों में निचले पायदान पर खड़े है। स्वास्थ्य सेवाओं में कमी के कारण क्या है?
  • सरकार द्वारा स्वास्थ्य के क्षेत्र को तवज्जों न देना 2008 से 2015 के मध्य स्वास्थ्य क्षेत्र में सकल घरेलू उत्पाद का 1.3% ही सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च किया गया है।
  • प्रशासन का स्वास्थ्य क्षेत्र के प्रति संवेदनशील न होना हर साल बिहार में चमकी (एम्यूट
    इंसेफिलाइटिस संड्रोम) से लोग मरते हैं लेकिन अभी तक इसका कोई समाधान नहीं है।
  • प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर चिकित्सकों की कमी होना।
  • चिकित्सकों द्वारा ग्रामीण क्षेत्र में कार्य करने में रूचि न लेना।
  • चिकित्सा के क्षेत्र में शोध न होना। स्वास्थ्य सेवाअों का लोगों की पहुँच से बाहर होना।

कैसे स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार किया जा सकता है?

  • सरकार को स्वास्थ्य क्षेत्र में खर्च बढ़ाना चाहिए जो सकल घरेलू उत्पाद का 2.5% से ज्यादा हो।
  • सरकार को सबसे जयादा ध्यान प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के सुधार तथा वहाँ चिकित्सकों की व्यवस्था पर देकर स्वास्थ्य सेवाआें में सुधार किया जा सकता है।
  • सरकार प्राथमिक सेवा केन्द्रों को PPP मोड पर देकर भी सुधार कर सकती है।
  • आयुष्मान भारत (स्वास्थ्य बीमा) के उचित क्रियान्वयन तथा इसमें और अस्पतालों को शामिल कर स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार किया जा सकता है।
  • सरकार स्वास्थ्य सेवाओं के विकास के लिए अधिभार पर भी विचार कर सकती है ताकि सरकार पर ज्यादा बोझ न बढ़े।

आगे की राह


नीति आयोग प्रति वर्ष यह रिपोर्ट इसीलिए जारी करता है ताकि राज्यों में विभिन्न मानकों पर प्रतिस्पर्धा का माहौल बने और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार हो लेकिन बिहार तथा उत्तर प्रदेश जैसे राज्य नीति आयोग के प्रतिस्पर्धात्मक दृष्टिकाेण को नहीं समझ पाए तथा सुधार करना जरूरी नहीं समझा। इसी का नतीजा एक्यूट जापानी इंसेफिलाइटिस सिंड्रोम से 300 बच्चों की मौत के रूप में भुगतना पड़ा। नीति आयोग का कार्य सराहनीय है, वक्त है कि निचले पायदान के राज्य नीति आयोग के दृष्टिकोण को समझे और अन्य राज्यों से प्रतिस्पर्धा कर राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार करें।

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