सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक 2019

सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक 2019

क्या है खबर?

हाल ही में सरकार ने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 में संशोधन प्रस्तुत किया है जिसे सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक 2019 कहा गया है इसे लोकसभा से मंजूरी प्राप्त हो चुकी है।

क्या है नए विधेयक के संशोधन?

  • नए विधेयक में राज्य सूचना आयोग तथा केन्द्रीय सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्तों की सेवा शर्तों में संशोधन किया गया है। अत: यह धारा 13 व 16 को संशोधित करता है।
  • सूचना आयोग, एक विधिक निकाय है इसमें राज्य तथा केन्द्र के मुख्य सूचना आयुक्तों तथा सूचना आयुक्तों को संवैधानिक निकाय के चुनाव आयुक्तों तथा न्यायाधीशों के समान सेवा शर्तों में अंतर प्रतिस्थापित किया गया है।
  • सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 में केन्द्र तथा राज्य के मुख्य सूचना आयुक्तों तथा सूचना आयुक्तों को पाँच वर्ष या 65 वर्ष (जो पहले हो) तक नियुक्त किया जाता था लेकिन यह संशोधन मुख्य सूचना आयुक्तों और सूचना आयुक्तों के कार्यकाल को केन्द्र
    सरकार के प्रसाद पर्यन्त ला देता है।
  • पूर्ववर्ती अधिनियम में मुख्य सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्तों (केन्द्र) का वेतन चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त (मुख्य सूचना आयुक्त के लिए) तथा चुनाव आयुक्तों (सूचना आयुक्तों के लिए) के समान होता था लेकिन यह संशोधन केन्द्र सरकार को वेतन निर्धारण करने का अधिकार देता है।
  • पूर्ववर्ती अधिनियम में राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्तों का वेतन क्रमश: चुनाव आयुक्त तथा मुख्य सचिव के समान होता था लेकिन यह संशोधन केन्द्र सरकार को वेतन निर्धारित करने का अधिकार देता है।
  • इस संशोधन के बाद केन्द्रीय तथा राज्य के मुख्य सूचना आयुक्तों तथा सूचना आयुक्तों के वेतन से पेंशन की कटौती (केन्द्र/PSU/राज्य का कर्मचारी होने पर प्राप्त पेंशन) नहीं होगी पहले इनका वेतन पेंशन के समान राशि काटकर दिया जाता था इस संशोधन से इस प्रोविजन को हटा दिया गया है।

क्या सकारात्मकता है इस संशोधन में?

  • इससे विधिक तथा संवैधानिक निकायों में अंतर स्थापित किया गया है।
  • केन्द्रीय नियंत्रण से आयुक्तों द्वारा संवेदनशील सूचना के बाहर लाने के लिए सरकारों को बाध्य किए जाने की घटनाओं में कमी आएगी।
  • हालांकि इस संशोधन में सकारात्मकता कम प्रतीत होती है।

क्या नकारात्मकता स्थापित हो सकती है इस संशोधन से?

  • इससे केन्द्रीय तथा राज्य आयोग, सूचना प्रदान करने वाले विभाग बन जाएंगे क्योंकि कार्य एवं शर्तें सरकार द्वारा निर्धारित होगी।
  • यदि किसी सूचना को आयोग द्वारा बाहर लाने हेतु बाध्य किया गया तो सरकार संबंधित सदस्यों को हटा सकने की स्थिति में होगी इससे इस अधिनियम का अस्तित्व ही खतरे में आ जाएगा।
  • इससे सरकारी विभागों में पारदर्शिता में कमी आ सकती है।
  • इससे हमें आयोगों के वे निर्णय देखने को नहीं मिलेंगे जिसमें आयोग द्वारा राजनीतिक पार्टियों को सूचनाओं का खुलासा करने हेतु बाध्य किया गया था, हालांकि अभी भी राजनीतिक पार्टियाँ सूचनाओं का खुलासा करने के लिए बाध्य नहीं है।

निष्कर्ष –

संविधान का अनुच्छेद 19 (1) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है और व्यक्ति अपनी अभिव्यक्ति में संवर्धन तभी कर सकता है जब उसके पास सूचनाएँ हो, बिना सूचना के व्यक्ति की अभिव्यक्ति में शुद्धता नहीं आ सकती, इसी को ध्यान में रखते हुए सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 अधिनियमित किया गया जिसने पारदर्शिता (सरकारी प्रशासन में) लाने में मुख्य भूमिका निभाई है लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि इससे प्रशासन का बोझ बढ़ा है तथा कई लोगों ने प्रशासन से बेतुकी सूचनाएँ माँगी तथा उसे परेशान किया। सरकार को संशोधन के माध्यम से इसमें सामंजस्य स्थापित करना चाहिए था लेकिन सरकार ने इसकी शक्तियाँ कम कर दी, यदि सरकार की नियत अच्छी है तो यह अधिनियम भी सकारात्मक होगा।

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