“तकदीर के भरोसे मैं कुछ भी छोड़ता नहीं”

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“तकदीर के भरोसे मैं कुछ भी छोड़ता नहीं”

बगावत खुद से जीत के लिए करनी पड़ेगी।
इमारत की बुलंदी के लिए नींव भरनी पड़ेगी।

पथरीले इन रास्तों पर परीक्षा कड़ी होगी।
पर यकीं रखो जीत भी उतनी बड़ी होगी।
मेरी खुदी मुझसे कभी बेदखल होती नहीं।
इन जरा सी चोटों से मेरी आँख रोती नहीं।
वक्त बुरा भी आकर मुझे कभी तोड़ता नहीं।
तकदीर के भरोसे मैं कुछ भी छोड़ता नहीं।

झंकार अपने दिल की भी सुन लिया करो।
बिखरे तंतुओं को आकार में बुन लिया करो।
सूरज की रोशनी कुछ वजह से मिलती है।
कलियां बिना सख्त धूप के कहाँ खिलती है?
चला एक बार तो मैं खुद को मोड़ता नहीं।
तकदीर के भरोसे मैं कुछ भी छोड़ता नहीं।

तराने मुझसे अच्छे यहाँ कोई नहीं गाता है।
हुनरमंदों में अपना नाम सबसे ऊपर आता है।
दुपहरी में हमको कभी भी नींद आती नहीं।
आये तो फिर जिल्लत खयालों से जाती नहीं।
बेईमानी से कमाया गुल्लक में जोड़ता नहीं।
तकदीर के भरोसे मैं कुछ भी छोड़ता नहीं।

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