कॉलेजियम प्रणाली पर उठते सवाल

कॉलेजियम प्रणाली पर उठते सवाल

क्या है खबर?

हाल ही में इलाहाबाद हाइकोर्ट के जज रंगनाथ पांडेय ने कॉलेजियम पर सवाल उठाए थे अब संसद में भी कॉलेजियम पर सवाल उठाए हैं।

क्या कहा संसद ने?

  • राज्य सभा में शून्यकाल में भाजपा सदस्य अशोक बाजपेयी ने कॉलेजियम व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें जातिवाद, परिवारवाद से लेकर पेशेवर निकटता जैसे पहलुओं का बोलबाला रहता है।
  • यही वजह है कि सामान्य परिवार से कानून के क्षेत्र में आने वाले लोगों के लिए हाइकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट में जज बनना मुश्किल हो जाता है।संविधान में भी कॉलेजियम व्यवस्था का कोई प्रावधान भी नहीं है इसीलिए इसमें बदलाव होना चाहिए।
  • संसद में इलाहाबाद हाइकोर्ट के जन रंगनाथ पांडेय द्वारा प्रधानमंत्री को इस व्यवस्था में बदलाव हेतु लिखे गए पत्र का जिक्र किया गया।
  • संसद द्वारा सिविल सेवा की तर्ज पर निचली अदालतों में केन्द्रीय न्यायिक सेवा के जरिए जजों की नियुक्ति का समर्थन किया गया।
  • उपराष्ट्रपति एम. वैंकेया नायडू ने इस माँग के प्रति सांसदों की गम्भीरता को देखते हुए सदन में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के अधिकारों और उनकी सीमाओं पर चर्चा की जरूरत बताई।
  • शून्यकाल – यह प्रश्नकाल तथा सदन की प्रक्रिया शुरु होने के मध्य का समय है जिसमें सदस्यों द्वारा लोक महत्त्व के मुद्दों को उठाया जाता है ताकि वर्तमान परिदृश्य में लोक महत्त्व के मुद्दों पर सरकार की स्थिति स्पष्ट हो सके।

क्या है कॉलेजियम व्यवस्था?

  • यह हाइकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों को नियुक्त करने, स्थानान्तरण करने तथा न्यायाधीशों का अप्रेजल करने की व्यवस्था है जिसकी शुरुआत तृतीय जज केस (1998) से हुई।
  • इसका निर्माण सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा 4 सर्वोच्च न्यायालय के ही वरिष्ठतम् न्यायाधीशों के समूह से होता है।
  • यह कॉलेजियम केन्द्र सरकार को न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा स्थानान्तरण की सिफारिश करता है। केन्द्र सरकार कॉलेजियम को अपने तरफ से भी नाम सुझा सकती है तथा कॉलेजियम द्वारा की गई
  • सिफारिश को कॉलेजियम के पास पुन: विचार के लिए भी भेज सकती है लेकिन यदि कॉलेजियम द्वारा पुन: वही नाम सिफारिश के रूप में भेजा गया है तो केन्द्र सरकार सहमति प्रदान करने के लिए बाध्य है।
  • यदि कॉलेजियम द्वारा पुन: वही नाम केन्द्र सरकार को भेजा गया है तो केन्द्र सरकार सहमति प्रदान करने के लिए बाध्य है लेकिन इस सहमति की कोई समय- सीमा निश्चित नहीं है।
  • इसे प्रतिस्थापित करने के लिए केन्द्र सरकार ने दिसंबर,2014 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को क्रियान्वित किया था (99 वाँ संविधान संशोधन) जिसे 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक करार दिया।

क्या है न्यायिक नियुक्ति आयोग और इसे असंवैधानिक क्यों करार दिया?

  • न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग ने कॉलेजियम व्यवस्था को प्रतिस्थापित किया था आयोग का निर्माण सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठतम् न्यायाधीश विधि एवं न्याय मंत्री तथा दो प्राख्यात व्यक्तियों से होना था अत: इसमें कुल छह सदस्य थे।
  • दो प्राख्यात व्यक्तियों को एक समिति के द्वारा चुना जाना चाहिए था जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष का नेता या विपक्षी सबसे बड़ी पार्टी का नेता तथा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शामिल है।
  • न्यायापालिका ने न्यायिक नियुक्ति आयोग को असंवैधानिक ठहराकर कहा कि विधि एवं न्याय मंत्री का न्यायधीशों के चयन तथा स्थानांतरण की प्रक्रिया में शामिल होने से शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त को ठेस पहुँचती है तथा इससे कार्यपालिका द्वारा न्यायपालिका क्षेत्र का अतक्रमण होता है।

आगे की राह

न्यायपालिका की स्वतंत्रता सर्वोपरि है लेकिन स्वतंत्रता के नाम पर न्यायपालिका की पारदर्शिता के विषय को दरकिनार नहीं किया जा सकता है इसी को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय अब कॉलेजियम द्वारा लिए गए निर्णयों को अपनी वेबसाइट पर दर्शाता है लेकिन इसमें अभी काफी सुधर की आवश्यकता है और संसद द्वारा अखिल भरतीय न्यायिक सेवा का सुझाव उत्तम प्रतीत होता है इस पर विचार किया जा सकता है।

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