“अकल्पनीय सा आकार हूँ मैं”

“अकल्पनीय सा आकार हूँ मैं”

कलह की इस धरा से ऊपर
नभ का अनन्त विस्तार हूँ मैं
जो गीत सृजन का गाते हैं
उस मुक्त-कण्ठ का हार हूँ मैं

क्षुद्र कल्पनाओं में नहीं समाता
अकल्पनीय सा, आकार हूँ मैं
अथक जिगीषा के संवाहक हैं
उन हृदयों में अंगीकार हूँ मैं

स्खलित कभी पथ से हुई ना
आरण्यक निर्झर की धार हूँ मैं
ढूँढ़ लूंगा पथ, वरन् बना लूंगा
सहस्रों कथन का यहाँ सार हूँ मैं

अविश्रान्त खड़ा, मैं छांव लेकर
आँगन को मिला, उपहार हूँ मैं
अनुभूत कर कष्ट को,अतन्द्र सा
चहकती उमंगों का शृंगार हूँ मैं

व्याप्त प्रलय से भी जो ना बुझा
उद्दीप्त से दीप का सम्मान हूँ मैं
चंचल-चाह को परित्यक्त कर
कीर्ति-ध्वज का यशोगान हूँ मैं

हर झपकी में आता स्वप्न कोई
समझो अब जीत की हुंकार हूँ मैं
घन-घोर समर में, तुमुल नाद होगा
जन-क्रांति की क्षुब्ध झंकार हूँ मैं

विश्वस्त हूँ, कार्य फलीभूत होगा
नव संकल्पों संग पुनर्जात हूँ मैं
जीर्ण संस्कारों को नव रूप दूँगा
दुर्लभ मिट्टी में ढला गात हूँ मैं

Comment ( 1 )

  • Pritam

    Great Sir

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